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Saturday, 20 October 2018

पायरेसी टॉपिक पर विचार-विमर्श

पायरेसी के ऊपर बहुत से टॉपिक आपको फेसबुक और व्हाट्सएप्प ग्रुप पर मिल जायेंगे।आज हमारी चर्चा भी कॉमिक्स संबंधित पायरेसी पर है।
सबसे पहले ये जानने की कोशिश करते है,कि पायरेसी क्या होती है,क्यों होती है,किसलिए होती है,कौन करता है।उसके करने से किसी को क्या फायदा होता है, और किसको नुकसान होता है।
पायरेसी को ओरिजिनल कंटेंट की डब्लिकेट कॉपी या ज़ेरॉक्स कॉपी कहा जा सकता है।जिसका तुलना हम नकल से कर सकते हैं।
पायरेसी की जरूरत अपने ओरिजिनल कंटेंट को सेव करने के लिए भी की जाती है,उसको जब तक पायरेसी श्रेणी में नही कहा जा सकता,तब तक उस कंटेंट से उसको व्यावसायिक लाभ नही होता हो या किसी को नुक्सान नही होता हो।
उदहारण के लिए रामायण,महाभारत पर काफी पुस्तकें छपी है,तो जिस पब्लिकेशन ने इनके आधार को मानकर अपनी पुस्तकें छाप कर बाजार में बेची हो और इनसे फायदा उठाया हो तो क्या वो भी पायरेसी नही है क्या।नही जी ये पायरेसी नही है,अगर हम छपी हुई पुस्तक के कंटेंट को ज्यूँ का त्यौ प्रिंट कर उसको बेचते है,तो वो पायरेसी में आता है।
पायरेसी सस्ते और महंगे कंटेंट दोनों की जाती है,या जो कंटेंट मार्किट में आसानी से उपलब्ध नही हो।
पायरेसी से एक तरफ जहां व्यवसाय को नुकसान होता है,वही दूसरी तरफ पायरेसी करने वाले को भी कोई फायदा नही मिलता।क्योँकि उसने तो पायरेसी शेयर करने के लिए की है,लेकिन उसका नुकसान कंपनी ने उठाया।
अधिकतर कॉमिक्स पब्लिकेशन भी पुराने पब्लिकेशन के कंटेंट से आईडिया लेते है,जिनका मुख्य source विदेशी कॉमिक्स पब्लिकेशन है,वो वहां से इमेज वाइज इमेज की कॉपी भी कर लेते है।और उनकी स्टोरी को थोड़ा बहुत चेंज कर अपनी कॉमिक्स में प्रिंट कर देते है,यहाँ तक कुछ पब्लिकेशन तो अन्य हिंदी पब्लिकेशन से कॉपी कर लेते है,तो यह सब पायरेसी में ही आता है।
कुछ मजबूरीवश पायरेसी का सहारा लेते है,क्योँकि वो कंटेंट या तो काफी महंगा होता है या बाजार में उपलब्ध नही होता,कुछ अज्ञानवश करते है,और कुछ कुंठित होकर।लेकिन कोई भी सही नही है।
इसलिए पायरेसी को रोक पाना लगभग असंभव सा काम है,इसके लिए कंपनियों को अपनी सामग्री को जेनुइन रेट में उपलब्ध करवाना पड़ेगा, ताकि सभी इसको ख़रीद सकें।

Thursday, 18 October 2018

नॉवेल लिस्ट

राज भारती
कमलकांत सीरिज
1. तिगनी का नाच
2. तेरी गर्दन मेरे हाथ
3. त्रिशूल
4 मौत खङी तेरे द्वार
5. विष क्या
6. हिसाब बराबर
7. कातिल माने ना
8. काम तमाम
9. सारे दिमाग मेरे शिकार
10. दिल तो कातिल है
अग्निपुत्र सीरिज

1. मायाजाल
2. महादण्ड
3. खुदा का बेटा
4. महाबली
5. महाक्रोधी
6. महारथी
7. महायोगी
8. महामंत्र
9. महाकाल
10. महादाह
11. महामंत्र
12. महापाप
13. महाविनाश
14. महासंग्राम
15. महाकुण्ड
16. अग्निपुत्र
17. रक्तपात
18. रक्तधारा
19. मिस्त्री शहजादी
20. रक्त सिंदूर
21. रक्त सागर
22. शंग्रीला
23. रक्त पिपासु
24. रक्त रेखा
25. रक्त आहुति
26. रक्त कलश
27. रक्त-सुरा
28. रक्तांचल
39. रक्तदेव
30. रक्त -भैरवी
41. रक्त-मंथन
42. मृत्युराग
43. मृत्युदंश
44. मृत्युधाम
45. मृत्युजाल
46.. मृत्युरथ
47. मृत्युद्वार
48. शाही रक्कासा
49. सफेद कबूतरी
50. मल्लिका का ताज
51. शाही जल्लाद
52. ताजपोशी
53. जादूगरनी
54. दोधारी तलवार
55. रक्त-मंदिर 
56. तौर ग्रह के हत्यारे
57. तौर ग्रह के देवता
58. मंगोल सुंदरी
60. तौर ग्रह के छापामार
61. अभिसारिका
62. सुर्ख सैलाब
63. सरहदी भेङिये
64. शिकारी मल्लिका
65. तौर के लूटेरे
66. रेगिस्तानी कबीले की मल्लिका
67. हुंकार
68. आमरा
69. आमरा का इंतकाम
70. विनाश चक्र
71. बिल्ला हरूमा
72. शिंगूर के दरिंदे
73. शाबा
74.शंखनाद
75. महायोद्धा (65 वा उपन्यास, अग्निपुत्र)
ये सब राजभारती के नावेल है.

Sunday, 16 September 2018

कॉमिक्स जंक्शन

लौट रही है कॉमिक्स

रचनाकार – गौरव कुमार निगम


हर साल की तरह इस साल भी गर्मियों की छुट्टियां लौट आयी हैं, लेकिन हर साल गर्मियों की छुट्टियों के साथ ही गली गली में दिखाई देने वाली एक चीज धीरे धीरे गायब होती जा रही है…कॉमिक्स।

नब्बे के दशक में, जब ज्यादातर लोगो के पास मनोरंजन के लिए बड़ी मुश्किल से एक अदद शटर वाला ब्लैक एंड वाइट टीवी हुआ करता था जो कि कभी बड़ो के आँख तरेरने पर और अक्सर बिजली ना होने की वजह से बंद ही रहता था तब समय काटने के लिए नौजवानों के लिए लुगदी उपन्यास और बच्चों के लिए कॉमिक्स ही भरोसेमंद सहारा हुआ करते थे। अस्सी और नब्बे का दशक कॉमिक्स इंडस्ट्री का स्वर्णकाल कहा जा सकता है। गर्मियां आते ही गली के कोने की किसी दुकान पर कॉमिक्स सज जाती थी…कुछ एक पतले तार पर लटकाई हुई और बाकी एक ढ़ेर की शक्ल में दुकान के एक कोने में रखी हुई।
तब नागराज, सुपर कमांडो ध्रुव, डोगा, हवलदार बहादुर, क्रुकबांड, चाचा चौधरी जैसे पात्र बच्चों के बीच किसी सुपरस्टार का दर्जा रखते थेI

इंडियन कस्टमर, जो कि अक्सर बच्चे हुआ करते, की परचेजिंग कैपेसिटी कम हुआ करती थी क्यूंकि जेब खर्च सीमित मिलता थाI सो कॉमिक्स ज्यादातर किराये पर ही ला कर पढ़ने का रिवाज था…पतली वाली के 25 पैसे और डाइजेस्ट कॉमिक्स के 50 पैसे पूरे 24 घंटे के लिये तय किराया हुआ करता था, जिसमें देर होने पर बाकायदा डबल किराया वसूलने का भी मौखिक प्रावधान हुआ करता था।












सयाने बच्चे आपस में तीन चार बच्चों का ग्रुप बनाकर एक साथ 3 या 4 कॉमिक्स किराये पर ले आते थे और किसी एक के घर में बैठकर सारी कॉमिक्स पढ़कर अगले दिन वापस कर आते थे…यानी एक कॉमिक्स का किराया देकर एक से ज्यादा कॉमिक्स के मजे ले लिया करते थे। दूकानदार इसके बदले कॉमिक्स के साथ मिलने वाली फ्री आइटम्स जैसे कार्ड्स, स्टिकर, पोस्टर्स वगैरह उन बच्चों को ही औने पौने दाम पर बेचकर अपना प्रॉफिट पूरा कर लेता था

नब्बे के दशक के बाद इंडियन कॉमिक्स इंडस्ट्री को सबसे ज्यादा चोट घर घर पहुँच चुके केबल टीवी ने पहुंचाईI जो कहानियां चित्रों के रुप में मिलती थी वैसी कहानियां कार्टून शोज के रूप में ज्यादा आकर्षक तरीके से बच्चों के सामने पेश की जाने लगींI जिन किस्सों के लिए दुकान तक दौड़ लगानी पड़ती थी, वो कहानियां घर के एक कमरे में रखे टीवी पर ही मिल जा रही थीI

कॉमिक्स की मांग घटने लगी क्यूंकि बच्चों के माँ बाप को भी दो सौ रुपये महीने में कॉमिक्स के ऊपर खर्च करने से बेहतर केबल टीवी कनेक्शन पर खर्च करना सही लगता थाI कॉमिक्स तो सिर्फ बच्चे या किशोर पढ़ते थे, केबल टीवी सबका मनोरंजन करने में सक्षम था…साथ ही अपने शुरुआती दौर में केबल कनेक्शन रखना भी अपने आप में आज के दौर के लेटेस्ट मोबाइल फ़ोन रखने जैसा स्टेटस सिम्बल थाI

कॉमिक्स इंडस्ट्री के इस गिरते रुझान के बीच भी राज कॉमिक्स, मनोज कॉमिक्स, डायमंड कॉमिक्स जैसे कुछ प्रतिष्ठित प्रकाशनों ने कॉमिक्स छापने और उन्हें बढ़ावा देने का सिलसिला जारी रखाI
कॉमिक्स इंडस्ट्री को अगली तेज़ चोट सन 2005 के बाद इन्टरनेट के तेज़ी से बढ़ते असर की वजह पहुंचीI
इन्टरनेट ने कॉमिक्स की पाइरेसी करके सर्वसुलभ बना दिया, जिससे कॉमिक्स इंडस्ट्री को तगड़ा नुकसान उठाना पड़ाI कॉमिक्स से प्रेम और जुनून के नाम पर लोगों ने कॉमिक्स को स्कैन कर के इन्टरनेट पर डालना शुरू कर दियाI बिना कुछ खर्च किये कॉमिक्स हर किसी को पढने के लिए उपलब्ध हो गयी जिसकी वजह से कॉमिक्स और भी महंगी होती चली गयीI
कॉमिक्स इंडस्ट्री के लिए शायद ये सबसे बुरा दौर थाI
कॉमिक्स पब्लिश करना घाटे का बिज़नस बनता जा रहा थाI एक तरफ़ पुरानी कॉमिक्स फ्री में पढने के लिए मिल रही थी दूसरी तरफ नयी कॉमिक्स का महंगा होते जाना उसकी बिक्री पर असर डाल रहा थाI रही सही कसर इन्टरनेट और टीवी ने पूरी कर दी थीI
लेकिन कहते हैं ना कि समस्या जहाँ पैदा होती है, उसका समाधान भी अक्सर वहीँ मिलता हैI
कॉमिक्स इंडस्ट्री ने बदलते वक़्त और तकनीक से पैदा हुई समस्या का हल बदलते वक़्त के हिसाब से बने तौर तरीकों और तकनीक से देना शुरू कियाI
कॉमिक्स इंडस्ट्री ने नए लेखकों, आर्टिस्टों को मौका देना शुरू किया जो नयी कहानियों के साथ मार्किट में आयेI
कई कॉमिक्स पब्लिशिंग हाउस ने अपनी वेबसाइट और ई कॉमर्स वेबसाइट के ज़रिये कॉमिक्स बेचना शुरू किया जिससे कॉमिक्स छपने से लेकर खरीदने वाले के हाथ में पहुँचने तक के खर्चे कम किये जा सकेंI ‘कॉमिक कॉन’ जैसे इवेंट्स होने शुरू हुए जिससे लोगों के बीच कॉमिक्स को लेकर उत्साह बढ़ाI पुस्तक मेलों में भी कॉमिक पब्लिशर्स जाने लगे जिससे उनकी बिक्री और प्रसार बढ़ाI
अब तक कॉमिक्स सिर्फ बच्चों की चीज मानी जाती थी लेकिन अब वो एक ‘कूल थिंग’ बननी शुरू हो गईI
बीच बीच में ख़बरें आती रहती हैं कि सुपर कमांडो ध्रुव की कहानियों को लेकर सीरियल बन रहा है, (नागराज के कुछ एपिसोड बने भी थे), डोगा पर आधारित फिल्म बन रही है जिसमे कुणाल कपूर डोगा बनने की पूरी तैयारी कर चुके हैं, परमाणु को लेकर वेब सीरीज बन रही हैI ऐसी ख़बरों ने कॉमिक्स पढ़ने वालों के बीच एक नया जोश फूंक दिया हैI
हाल ही में राज कॉमिक्स ने अपना एप्प लांच किया जिसके ज़रिये अब वो आज की नयी पीढ़ी जिनके हाथों का स्मार्टफ़ोन ही उनकी किताबें हैं, को कॉमिक्स पढने की आदत डाल रहे हैंI

हो सकता है किसी दौर में हमारी किताबों में, अलमारियों में छुपी रहने वाली प्रिंट कॉमिक्स आने वाले वक़्त में छपना ही बंद हो जाये,  लेकिन ‘कॉमिक्स’ लौट रही हैं और उनका भविष्य पहले से ज्यादा उज्जवल हैI

Friday, 20 January 2017

कॉमिक्स यानी चित्रकथा की कहानी

कॉमिक्स या चित्रकथा का इतिहास जानने बैठें, तो कई-कई सूरज उगेंगे और चांद ढल जाएंगे। और आज तो इस विधा का संसार इतना बढ गया है कि एक आर्मी चाहिए - बांचने और समझने के लिए।
अमेरिकी कार्टूनिस्ट 'स्कॉट मेकलाउड' ने कॉमिक्स के इतिहास की रोचक ग्राफिक बुक 'अंडरस्टैंडिंग
कॉमिक्स' लिखी। सारा कंटेंट चित्रकथा के रूप में लिखा गया है। यह एक अद्भुत प्रयोग है। उनके अनुसार 'बहुत सारी परिभाषाओं का एक सार है कि क्रमबद्ध चित्रों की सारणी ही कॉमिक्स है।' मजाक ही सही, मगर ज्यादातर प्रचलित परिभाषा है जो स्कॉट ने अपनी पुस्तक में भी लिखा है, 'कॉमिक्स वे रंग-बिरंगी पत्रिकाएं हैं, जिनमें कामचलाऊ चित्र, फ्रालतू कहानियां और चुस्त पतलूनों वाले लड्के हों।'


ऐसा क्यों हुआ... कहां हुआ और कब हुआ

अगर संदर्भ उठाकर देखें, तो रोम में 113 ई.पू. में पहली _ बार ट्रोजन के स्तंभ पर चित्रों के माध्यम से किसी बात या घटना को कहा गया। जहां ट्राजन की गौरवगाथा को पत्थर के एक खंभे पर ऊपर से लेकर नीचे तक उकेरा गया। 98 फ्रीट लंबे खंभे पर बहुत बारीकी से बनीं मूर्तियां। ऐसा लगता है जैसे किसी घटना को फ्रीज कर दिया हो और उसके जडवत मिनिएचर को खंभे पर चिपका दिया। वीरता के किस्से खंभे के चारों तरफ बनाए गए और खंडों में बंटा पिलर नीचे से ऊपर गाथा को सिलसिलेवार बढाते हुए प्रस्तुत हुआ। यह बात प्रिंटिंग के दौर से पहले की है, बल्कि बहुत पहले की है। भारत मैं चित्रकथाएं देवी-देवताओं के आख्यानों से सामने आईं। भगवान को सजाकर, वर्क लगाकर उससे सुंदर चित्र बनता, कमोबेश पृथ्वी की सारी सभ्यताएं ऐसा ही करती रही हैं और लोककलाओं में अपनी अंत:प्रेरणा से लोककथाएं रचते, गढते, जीते, और चित्रकथाएं सुनाते, संवारते और सजाते थे।
स्कॉट और अन्य संदर्भों के अनुसार 1519 में कोरटेस का 'डिसकवर्ड', उसके सौ साल पहले फ्रांस में 'बॉयक्स टेपस्टरी', यह कहीं इंग्लैंड में दो सौ फीट लंबी पट्टी पर बनी। फिर कॉमिक्स तो नहीं कहेंगे, मगर मिस्र के चित्रलिपि दृश्य। कहने को तो शब्द थे, मगर थे चित्रों में... एक नजर में तो मिस्र की चित्रलिपि दिखने में कॉमिक की परिभाषा पर खरी उतर रही है, सिलसिलेवार चित्रों से, जो कुछ कह सके, मगर यह चित्र भाषा है। सुना तो यह है कि जब लिखित भाषा नहीं थी, तब बस भाव थे और यही 'चित्र संवाद' इस आर्ट की भूमिका बनी। गुफाओं की दीवारों पर कहने और सुनने की आडी-तिरछी लकीरें... कभी प्रेम प्रदर्शन करतीं, तो कभी विरह के चित्र बनातीं, तो कभी दंड के दृश्य दिखातीं... कोई संवाद नहीं, बस चित्र।
नाट्यशास्त्र में कहा गया कि भाषा के अभाव में लोग अपनी बात इशारों में करते थे और वहीं से अभिनय की नींव पडी। अगर ऐसा था, तो अपने विचार तो वह लोग इशारों में प्रकट कर ही सकते थे, फिर यह चित्रों का क्या माजरा है?
अगर संदर्भों को टटोलें तो सारा डेटा यही कहता है कि, 'भाई, लिखित भाषा नहीं थी, इसीलिए चित्र थे', मगर मुझे लगता है संवाद के रूप में इशारे थे और गहरे विचारों व भावुक घटनाओं के लिए चित्र। अपने बहुत गंभीर भावों को बताने के लिए वे चित्र बनाते होंगे। :
स्कॉट अपनी किताब में लिखते हैं, 'मुझे कोई आइडिया नहीं है कि कॉमिक का जन्म कब, कहां और कैसे हुआ? लोगों को इसकी कसरत करने दो' और आधुनिक कॉमिक के पितामह स्विस कार्टूनिस्ट रुडोल्फ टफर कहते हैं, 'चित्रकथा जिसकी आलोचक उपेक्षा करते हैं और विद्वान शायद ही नोटिस करते हैं, जिसका सदैव प्रभाव रहे मुमकिन है, लिखे हुए साहित्य से भी अधिक।' वह फिर कहते हैं, 'और आगे कहूं तो चित्रकथाएं बच्चों और निम्न वर्ग को अधिक अपील करते हैं।'
कब हुआ? यह तो यक्ष प्रश्न है... शायद पहली बार प्रेम का इजहार किया होगा तब, और उस आनंद को चित्रों में उकेर दिया होगा। या पहली बार दिल टूटा होगा, तब बना होगा चित्र...
या किसी के भय की प्रस्तुति रहा होगा कोई चित्र। मिस्र के पिरामिडों में जब शासक के साथ उसके आराम की चीजें और सेवक भी दफन किए जाते रहे, तब वहां चित्रों से उस शाही परंपरा को दीवारों पर उकेरा जाता रहा। हम तक फेरोओं के भित्ति-चित्रों और बुतों से यह बातें पहुंचीं।
मिस्र की चित्रात्मक लिपि और चीन की चित्रलिपि उनकी भाषा का उद्गम है।
पत्थर को जब खुदा बनाया होगा और एक छोटी-सी बिंदी लगाकर आदिमानव ने सबसे पहला चित्र बनाया होगा।

चित्र परमानेंट हो गए

यह तब हुआ, जब प्रिंटिंग का आविष्कार हुआ। दीवारों और गुफाओं से चित्र कागजों पर आए और विशेष वर्ग से आम लोगों तक पहुंच गए। विषय नहीं बदले थे। अब भी प्रभु और नायकों से जुडे विषयों पर चित्र बनते थे।
भारत और विकासशील देशों में अभी तक यह आविष्कार नहीं पहुंचा था। हां, उससे बहुत पहले भारत में भोजपत्रों पर रंगों से लिखा जाने लगा था, जो ईश्वरीय दर्शन और भाव से जुडा था। चित्रकथाएं थीं, जो फडों यानी कपडों पर बनती विशेषकर राजस्थान के मेवाड अंचल में। कई मीटर लंबे कपडे को पाबू जी लोकनायक की विजयगाथा को प्राकृतिक रंगों से बनाया जाता और भोपा-भोपी उसे पढते, अर्थात यह लोक-परंपरा थी। कथा, पर कोई डायलॉग नहीं लिखे थे, बस चित्र थे और वाचक थे या फिर महाराष्ट्र के वरली अंचल के वरली 'चित्र' और इसी तरह अन्य हिस्सों में भी।
यह बहुत लंबी और बडी चर्चा है कि चित्रकथाएं या कॉमिक्स और कार्टून अलग-अलग हैं क्या?

फिर चित्रों में व्यंग्य आ गया, कहलाने लगा 'कॉमिक

'स्पीच बलून' ...एक छोटा-सा गुब्बारा, चित्रकथाओं में पात्रों के संवाद का टूल। संवादों से पता चलता है कि जैसे ही विचारों का रचनात्मक होना शुरू किया, बस यह विधा सुंदर, रंगों भरी और बहुत क्रिएटिव होने लगी। राजनीतिक और सामाजिक स्थितियों पर व्यंग्य, चूंकि व्यंग्य था, इसीलिए कॉमिक और अचानक सभी चित्रकथाएं कॉमिक कहलाने लगीं।
18वीं सदी में सबसे पहले अमेरिका की कॉमिक पट्टी, जो अखबारों में छपती थी, खूब पढी और पसंद की जाने लगी बड फिशर की 'मट एंड जेफ' रोज अखबार में छपती थी और उसी क्रम में आई रिचर्ड एफ. ऑटकॉल्ट की 'द येलो किड:' दोनों कथाएं व्यंग्य थीं और सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक कठिनाइयों का समाधान हंसी-मजाक से देते थे। अठारहवीं सदी के आरंभ में, हॉ कुसाई का 'मंगा' छोटी स्टिप के रूप में 'कार्टून' या चित्रकथा कहीं जापान में छपी।
दुनिया में कहा जाने लगा कॉमिक, जो आपको आनंद दे। जैसे जापानी दूसरे विश्वयुद्ध तक व्यंग्य के चित्रपट पेश करते थे। लगा 'कॉमिक' उपयुक्त शब्द है चित्रों से कही जाने वाली एक कथा, एक कथाकार, एक चित्रकार। सहज चित्र जिनके भाव बहुत अतिरंजित हैं कार्टून कहलाए।

भारतीय कॉमिक्स की दुनिया

भारत में कॉमिक्स की एक समृद्ध दुनिया 1970 और 1980 के दशक के बीच रही। राज कॉमिक्स के किरदार नागराज, सुपर कमांडो ध्रुव, डोगा, परमाणु, भेडिया और तिरंगा बच्चों के सपने में आकर जीवंत हो जाया करते थे। डायमंड कॉमिक्स के जरिए बचपन चाचा चौधरी, साबू और मोटू-पतलू जैसे किरदारों के बीच मनोरंजन और सीख की बातें बडी सहजता के साथ अपनाता था। बाद के दिनों में कॉमिक्स को टेलीविजन ने कॉर्टून की दुनिया में रिप्लेस कर दिया।

चित्र जो बात को जेहन में बसा दें

यह तो सनातन सत्य है कि विजुअल कम्युनिकेशन सबसे प्रभावशाली और स्थाई याद है। प्रिंटिंग और ढेर सारे कॉमिक पात्रों, कथाओं के आने के बाद भी भारत में भी मध्य उन्नीसवीं सदी में एक उच्च तबके तक जिनके पास विदेशी पत्र-पत्रिकाएं आती थीं। फिर अखबारों में अंग्रेजी कॉमिक कथाएं आने लगीं। उसके बाद इंद्रजाल कॉमिक्स ले आया फेंटम और मेंड्रेक...
और यह कथाएं हिंदी में आने लगीं ...जैसे कथा कहने की दुनिया ही बदल गई। बेताल उनकी प्रेमिका डायना और गुर्रन हमारे खेलों का हिस्सा बन गए। हम मेंड्रक की जादुई दुनिया के दीवाने हो गए। और फिर भारतीय कार्टूनिस्ट की पत्रिकाओं में कॉमिक पट्टियां, जिनमें विशेषकर आबिद सुरती जो लंबे समय तक अंतिम पृष्ठ पर छपते रहे, कार्टून कोना 'ढब्बू जी' में। आर.के. लक्ष्मण का कॉमन मैन और अमर चित्रकथा ने भारतीय कथाओं को चित्रों में जीवित कर देश को भारतीयता का उपहार दिया। कॉमिक्स का रचना संसार आज भी जारी है।

हमारे साथ जीने लगे

अचानक जैसे एक प्यारा-सा विस्फोट हुआ। वॉल्ट डिज्नी ने उन चित्र पात्रों की दुनिया ही बसा दी। सभी जानते हैं, एक नई विधा का आविष्कार कर दिया। वह चित्र कथाएं जिन्हें इंटेलेक्चुअल श्रेणी में नहीं रखा गया था आज स्थाई संवाद का माध्यम बन गई।
विकासशील देशों के कलाकार बहुत जल्दी शाही और देवी-देवताओं के कथानक से बाहर आ गए। उन्होंने रहस्य, जादू, जानवरों का मानवीयकरण और साहसिक कथाओं को आधार बनाकर चित्रों को कहा। आज ग्राफिक उपन्यास और दर्शन भी ग्राफ्रिकली लिखे जा रहे हैं। सहज चित्र हमें जीवन की सीख दे रहे हैं विलियम और जॉसेफ के टॉम और जेरी कहते हैं, 'मुसीबतें दिमाग से जीती जाती है', तो रेने गास्कीनी के ऐस्टरीक और ओबलिक्स कहते हैं, "बल और भोलापन साथ-साथ काम करता है', तो ली फाक का फेंटम और मेंड्रेक एडवेंचर कथाएं गढते हैं। अब तो इस विधा को बार-बार खंगाला जा रहा है। नई संभावनाएं बुनी जा रही हैं। ...एकदम गोल चांद ने आंखें घुमाकर इधर-उधर देखा और टप्प से दूधिया नदी के पानी में डुबकी लगा दी, पानी के छपाक-छपाक में पूरा भीग गया चांद, सफेद लकीरों की लहरें दूर और पास आने लगीं, मेंढक की टर्र-टर्र की आवाज, एक झींगुर पानी की मुस्कुराती बूंद के धवके से दूर जा गिरा। चांद ने आंखों की पुतली ऊपर चढाकर आसमान को देखा और मधुर संगीत के साथ धुला-धुलाया चांद फिर जा बैठा अपने ठिकाने ...ऐसा अद्भुत दृश्य तो कॉमिक्स में ही गढा जा सकता है। और अंत में आर्ट स्पिगलमैन के अनुसार, 'कॉमिक्स साक्षरता के प्रवेश द्वार की दवा है।'
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साभार - अहा! जिंदगी, दिसंबर 2015

Thursday, 12 November 2015

कॉमिक्स का इतिहास-गुज़र गए वो कॉमिक्स वाले दिन

90 के दशक में अगर आपका बचपना बीता है तो आप कॉमिक्स की दुनिया से जरुर वाकिफ होंगे। आजकल बच्चे अपनी गर्मियों की छुट्टियां आईपॉड और मोबाइल फोन के साथ बिताते हैं लेकिन 90 के दशक में आईपॉड किस चिड़िया का नाम है हम जानते भी नहीं थे।
ऐसे में गर्मियों की शाम तो खेलकूद कर निकल जाती थी लेकिन दिन काटना मुश्किल होता था। तो बस ऐसे वक्त में साथ दिया 'कॉमिक्स' ने। हम यहां आपको कॉमिक्स का इतिहास याद नहीं दिलाने वाले हैं। बस हमारी कोशिश है कि इन कॉमिक्स के जरिए थोड़ी देर के लिए ही सही आप अपने बचपन की सैर कर आएं। 
गर्मी की छुट्टियों के वो दिन याद हैं न जब हम कॉमिक्स खरीदने की जिद्द किया करते थे। अखबार वाले से कहकर महीने में एक बार या 15 दिनों में आने वाली कॉमिक्स का इंतजार करते थे और जैसे ही कॉमिक्स आती थी अगले दिन ही उसे पढ़कर चट कर जाते थे। यहां तक कि दुकानों से किराए पर कॉमिक्स खरीदकर भी पढ़ते थे।

धीरे-धीरे समय के साथ विडियो गेम और कम्प्यूटर गेम्स का आविष्कार होता गया और अब बच्चे कॉमिक्स कि दुनिया से दूसरी तरफ मुड़ने लगे। अब कॉमिक्स का बाजार भी धीरे-धीरे कम हो रहा है क्योंकि इसके खरीददार कम होते जा रहे हैं। 
पिछले साल हुई नीलामी में इंद्रजाल कॉमिक्स की पहली कॉमिक्स फ़ैंटम 1, 2, 3 की बोली कुल एक लाख रुपए लगाई गई। विश्लेषक हिंदी कॉमिक्स के प्रति लोगों के कम होते रुझान की वजह निम्नस्तरीय कहानियों और चित्रांकन बताते हैं। इसके साथ ही बाजार में बच्चों के मनोरंजन के लिए टीवी, वीडियो गेम वगैरह जैसे नए विकल्प होने की वजह से  90 के दशक के दूसरे हिस्से से ज्यादातर कॉमिक्स प्रकाशन बंद होते गए। इसके अलावा काग़ज़ और छपाई की बढ़ती कीमतों के चलते भी कई लोकप्रिय प्रकाशकों को अपनी प्रेस बंद करनी पड़ी।आज हम आपको भारत में हिंदी कॉमिक्स के इतिहास के बारे में बताते हैं-अंग्रेजी पात्रों के हिंदी अनुवाद से हुई थी शुरुआत 










भारत में कॉमिक्स प्रकाशन की शुरुआत देखें तो शुरू के वर्षों में हमें विदेशों के ही कॉमिक्स पात्रों के कॉमिक्स को हिन्दी में अनुवादित करके प्रकाशित करने का रिकॉर्ड मिलता है, जिसमें सर्वप्रथम नाम आता है ‘इंद्रजाल कॉमिक्स’ का जिसने 1964 में ‘ द फैंटम्स बेल्ट’ के नाम से महान कॉमिक्स लेखक और चित्रकार ली फॉक के प्रसिद्ध पात्र फैन्टम की कॉमिक्स प्रकाशित की थी।इसमें एक कॉमिक्स 28 पेज की होती थी और दाम 60 पैसे होते थे। इस तरह साल 1966 में प्रथम हिन्दी कॉमिक्स ‘वेताल की मेखला’ प्रकाशित हुई जो कि ‘द फैंटम्स बेल्ट’ का ही हिन्दी अनुवाद थी। इंद्रजाल कॉमिक्स में केवल कुछ ही मूल हिन्दी पात्रों की कहानियाँ प्रकाशित हुईं जिसमें बहादुर (प्रथम प्रकाशन वर्ष 1981) प्रमुख है। indrajal all character comics के लिए इमेज परिणाम
70 में आए ‘चाचा चौधरी’:-
इसके बाद साठ के दशक मे अमर चित्र कथा प्रकाशन का जन्म हुआ जिसमें पौराणिक कथाओं का जिक्र होता था। 1969 में लोटपोट पत्रिका से प्रकाशित की गई जिसमें सबसे पहले मशहूर कार्टूनिस्ट प्राण ने 1971 में चाचा चौधरी का पर्दापण किया था। 60 के दशक में कॉमिक्स भले ही भारत में आई हो लेकिन बच्चों में इसका क्रेज 70 के दशक हुआ था। इस दौरान कई नए प्रकाशक आए जिनमें डायमंड कॉमिक्स, मधु मुस्कान, आदर्श चित्र कथा, गोवरसंस कॉमिक्स प्रमुख हैं। इस दशक में ही कार्टूनिस्ट प्राण ने चाचा चौधरी, श्रीमती जी, पिंकू, बिल्लू और रमन जैसे किरदारों को जन्म दिया। 

80 के दशक में किरदारों का हुआ जन्म:-अस्सी के दशक में स्टार कॉमिक्स, चंदा मामा और चित्रभारती कथा माला जैसे नए प्रकाशक आए। वहीं अस्सी के दूसरे हिस्से में मनोज कॉमिक, तुलसी कॉमिक्स, राधा कॉमिक्स, पवन कॉमिक्स, नीलम चित्रकथा और राज कॉमिक्स जैसे और भी प्रकाशक आए। अब कहानियों के साथ किरदार भी बनने लगे। मनोज कॉमिक्स के पास राम रहीम (बाल जासूसों की जोड़ी), हवलदार बहादुर, महाबली शेरा और क्रूक्बांड जैसे किरदार थे और राज कॉमिक्स ने परमाणु, बांकेलाल, नागराज और सुपर कमांडो ध्रुव जैसे किरदारों को बच्चों के समक्ष पेश किया। 
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इस तरह होने लगा कॉमिक्स का अंत:-
अस्सी के दशक में प्रकाशकों की भरमार की वजह से पाठकों को अच्छी कहानी नहीं मिलती थी। नतीजा 90 के दशक के दूसरे हिस्से से ज्यादातर प्रकाशन बंद होने लगे। केवल कुछ ही प्रकाशन कॉमिक्स प्रकाशित कर रहे थे जिनमे राज कॉमिक्स, तुलसी कॉमिक्स, मनोज कॉमिक्स, डायमंड कॉमिक्स और अमर चित्र व प्रमुख थे। इसके बाद इनमें से राज और डायमंड कॉमिक्स ही बचे जिनकी अब कॉमिक्सों की संख्या में कमी आई है। कॉमिक्स के सामने एक बड़ी दुविधा पायरेसी की भी है।

Sunday, 22 January 2012

तुलसी कॉमिक्स प्रकाशक का इतिहास

तुलसी काॅमिक्स विगत 80, 90 एव 2000 के प्रारंभ की एक भारतीय काॅमिक्स प्रकाशक कंपनी थी, जो पहले तुलसी पाॅकेट बुक्स का भाग हुआ करती थी।अपने तुलसी पाॅकेट बुक्स के गुजरे दिनों में, यह भारत में हिंदी उपन्यास की लोकप्रिय प्रकाशन कंपनी हुआ करती थी और जिसने व्यापक स्तर पर अपने उपन्यास पाठकों का वर्ग तैयार कर लिया था, हालाँकि तुलसी काॅमिक्स अपने निम्न दर्जे की कहानियों के कारणों से कभी उच्च स्तर की सफलता हासिल ना कर सका, जैसा अन्य कंपनी जैसे डायमंड काॅमिक्स, राज काॅमिक्स एवं मनोज काॅमिक्स ने अपने मानकों को स्थापित कराया और इस वजह से सन् 2004 तक कंपनी बंद हुई।
वहीं तुलसी काॅमिक्स की असफलता का दूसरा कारण अपनी ही निर्मित कहानियों को 2-3 भागों में प्रस्तुत करना रहा है, और अधिकांश एकल अंक की कहानियाँ भी वे पूरी नहीं करते। वहीं उन दिनों के पाठकों में, जिनमें अधिकतर बाल वर्ग के थे उनकी जेबखर्ची भी बेहद सीमित होती थी, और लगभग इसी के उलट असर से, पाठक वर्गों के बीच अपनी लोकप्रियता खोने लगी थी। [citation needed] हालाँकि अब तक की सबसे लंबी कहानियों के तौर पर जम्बू श्रंखला की काॅमिक्सें काफी वर्षों तक चली थी।
हालाँकि इस पूरी सिरिज में तुलसी की सृजनात्मकता देखने को मिली करती थी, [citation needed] इस सिरिज ने एक लंबी पारी भी खेली, जहाँ हमें कई नए किरदारों से परिचय कराया गया जैसे योशो (तब पूर्व में उन्हें ओशो की भांति प्रस्तुत किया जाता था), योगा, बाज़ और मि. इंडिया को उनकी मृत्यु तक दिखाया गया। नए किरदार कहने को बहुत रूचिकर नहीं बनाए गए थे और पुराने किरदारों पर लगभग विभिन्न भागों की कहानियाँ जारी रही।[citation needed] तुलसी काॅमिक्स के किरदारों में जम्बू बहुत सफल रहा था, कमोबेश उनके रचियता वेद प्रकाश शर्मा ने, अंगारा तथा तौसी की भी रचना की।
तुलसी काॅमिक्स मासिक तौर पर अपनी काॅमिक्स प्रकाशित करती थी। हर माह ६ से १० तक गिनती की काॅमिक्से पहले प्रकाशित हुआ करती थी (कभी कभार १ या २ डाइजेस्ट जैसे विशेषांक भी प्रकाशित हुआ करती थी।) तब अंगारा, तौसी तथा जम्बू उस दौरान प्रकाशन के तीन प्रमुख नायक हुआ करते थे। उनमें से कई काॅमिक्स काफी लोकप्रिय भी रही जैसे जम्बू और अंगारा का युद्ध जम्बू और तौसी, मर गया जम्बू, एवं जम्बू के बेटे।

चरित्र

  • अंगारा – एक विलक्षण बुद्धिजीवी जिसमें गुरिल्ला, लोमड़ी, हाथी, गैंडा, गिद्ध और शेर के विशेषांग से प्रत्यारोपित कर बनाया गया हैं, जो मानव की तरह दिखता है।
  • तौसी – एक इच्छाधारी सर्पमानव। जिसे नागलोक का राजा बताया जाता (नागों की वह दुनिया जहाँ वे मानव रूप में निवास करते), जोकि धरती के गर्भ यानी पाताल लोक में स्थित है। वह समय समय पर धरती पर भी अवतरित करने भी आता है।
  • जम्बू – एक बेहद बुद्धिमान रोबोट, जिसके रचियता वैज्ञानिक डाॅ. भावा ने स्वयं का ही मस्तिष्क उसमें प्रत्यारोपित कराया। तुलसी काॅमिक्स का एक बहुत ही लोकप्रिय काॅमिक्स पात्र।
  • योशो – एक बेहद उग्र महानायक, जो अपने पिता की खोज में धरती पर आता है।
  • योगा – एक सामान्य मानव जो अपनी योगिक शक्तियों के बल पर महानायक बनता है।
  • बाज़ – एक सामान्य मनुष्य जो संयोगवश प्रेतों के राजकुमार भांति दिखने कारण, उसे राजकुमार की पोशाक दी जाती है, जिसकी अलौकिक शक्तियों का उपयोग वह अपराध के विरुद्ध करता है।
  • मि. इंडिया – एक उपनायक जिसे 5 वैज्ञानिकों के सम्मिलित प्रयासों से एक महाशक्तियाँ प्रदान होती है।
  • शालू-कालू – एक मजेदार लड़के-लड़की की जोड़ी। तुलसी काॅमिक्स की पहली सिरिज जिसमें व्यंग्यता देखने को मिली।
  • डिटेक्टिव भारत – एक डिटेक्टिव/गुप्तचर जो अपने मित्र जादूगर गोगलापाशा की सहायता से आपराधिक मामलों को सुलझाता है। अपनी पहली काॅमिक्स में वह जादूगर गोगलापाशा की मदद कर अपना दोस्त बना लेता है।[5]
  • महाबली आकाश/मेजर राजेश – एक नकाबधारी क्राइमफाइटर।
अन्य प्रकाशित नियमित किरदार - तुलसी काॅमिक्स द्वारा कई राजा-रानियों, राजकुमारों-राजकुमारियों, राक्षसों-दानवों-भूत प्रेतों तथा नैतिक मूल्यों को लेकल भी कहानियाँ प्रकाशित की हैं। वहीं उन्होंने काॅमिक्स शैली में कई हिंदी बाॅलीवुड फ़िल्मों की कहानियों पर आधारित प्रकाशन भी किया। मूल किरदारों की कमी के चलते, तथा आधे से भी कम काॅमिक्सों के प्रकाशन से अपना विस्तार देने में असफल रही।