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Thursday, 15 April 2021

हिमांशु भाई की कलम से

 एक बात गौर किजिएगा! 


वो तो राज कॉमिक्स निरंतर बिकती रही, और लगातार नागराज और ध्रुव की कॉमिक्सो को प्रकाशित करती रही! तो Company इतने सालों तक Running में रही!हां वक्त के साथ किमतों में बदलाव होना लाजिमी है! ...... ये जो हम दुसरे कॉमिक्स के किरदारों को 300/400 रूपये एक कॉमिक्स के दे देते हैं!


 जैसे:-.हवलदार बहादुर/राम रहीम/क्रुकबाण्ड अन्य पब्लिकेशन के किरदारों के! ........ वजह ये हैं की वो कॉमिक्सो कंपनियां अब रनिंग में हैं नहीं! ...... और संख्या में कम हैं इसलिए किमत़ ज्यादा हैं! उनकी कहानियां भी राज कॉमिक्स के मुकाबले औसत ही रही हैं! (ऐसा मेरा मानना हैं) 


    जैसे चाचा चौधरी को बच्चा-बच्चा तक पहचानता हैं! वैसे ही नागराज और ध्रुव का क्रेज भी भारतीय कॉमिक्स जगत में, उतना ही रहा हैं... और हैं भी! 


    ध्रुव-नागराज की कहानियां इतनी बार प्रकाशित हुई इसलिए इतने लोगों की जुंबा पर वो नाम आ पाया! ...... मैं खुद कॉमिक्स के स्वर्णकाल मैं पैदा नहीं हुआ उम्र की बात अगर की जाए तो कोहराम कॉमिक्स जितनी उम्र हैं मेरी! (April 2000) 😊

    मेरा कॉमिक्स क्रेज़ आप सब भली भांति जानते होंगे, 2000 के बाद मनोरंजन के कईं साधन विकसित हुए कागज़ पर आने वाले किरदार 30-32 इंच के डब्बे(T.v.) पर स्वचालित होने लगें, तो पढने की ज़हमत कौन करें? रही सही कसर इस 5-7 इंच के डब्बे (मोबाइल) ने पुरी कर दी! खैर इसी डब्बे की वजह से हम सब यहां हैं और ये ग्रुप हैं और कॉमिक्स का मार्केट भी तभी हैं|     

    2000 के बाद मैं भी कॉमिक्स फैन/लवर/ सेलर/बायर/कलेक्टर/ जुनुनी जो समझो वो बना ही हूँ.......

 अरे सॉरी ब्लेक मार्केटिया लिखना तो भूल ही गया 😊! 

    वजह ये थी कि तब तक ये किरदार कॉमिक्स की दुनिया में बने रहे! उनकी पापुलैरिटी ने मुझे भी कॉमिक्स से जोड़ दिया! ..... इसलिए डायमंड कॉमिक्स का स्लोगन " 5 साल के बच्चों से लेकर 80 साल तक लोकप्रिय" ये फिट बैठता है! Rc भी हर उम्र के पाठकों को बांधे रखती हैं! 

    दुसरी कॉमिक्स के जो दाम आप 300-400 देते आ रहे, मैनें भी कईं कॉमिक्से इतने में ही बेची हैं! ..... इसलिए की वो गुमनाम किरदार हैं! ..... कॉमिक्स की दुनिया में सेलर और कलेक्टर के लिए "Rare" शब्द का मतलब हैं की गुमनाम किरदारों की कॉमिक्स जो प्रचलन में नहीं वो रेयर हैं! 

   एक बार खुद सोचिए, नागराज और ध्रुव इतनी बार प्रिंट नहीं होती तो उन कॉमिक्स का रेट आज़ क्या होता? ब्लेक मार्केट में वो कितने की बिकती? ........ उदाहरण के लिए "किरीगी का कहर" आज़ कितने में बिकती? 

  आज़ की तारिख में Comics की किमतों का आकलन उसका अप्रचलन और गुमनामी तय करती हैं, ना की अच्छी कहानी और अच्छे चित्र से परिपूर्ण होना! 

   किमत़ निर्धारित करना कंपनी की अपनी मर्जी हैं! जरूरी नहीं आप हर कॉमिक्स लें, कॉमिक्स अब मुलभत आवश्यकता की चीज़ तो हैं नहीं कि लेना जरुरी हैं! इस देश में कुछ लोगो को दो वक्त के लिए रोटी-पानी नसीब नहीं हैं! कॉमिक्स मनोरंजन का एक साधन हैं, अपर-मीडिल क्लास वाले लोगों का थपका हैं एक! (किराए का दौर समाप्त होने के बाद)

   जिन कंपनियों ने मेरा बचपन बनाया, में कोशिश करूंगा की उन कंपनियों या उनके किरदारों कि मैं किसी प्रकार की आलोचना ना करुं, और नकारात्मकता फैलाकर पाठको को दुर ना करुं, या कॉमिक्स प्रेमी को नागराज-ध्रुव के प्रंशसको में विभाजित ना करूँ! सबसे यही दरख्वास्त करता हूँ जिन्हें जो पसंद हो उनकी कॉमिक्स ले! 💐 बस नकारात्मकता से दूर रहें! 

नयी कॉमिक्स कंपनी "फिक्शन" के रेट पता होंगे आपको की क्या थें, उसे कभी कहानी से तोल कर देखा हैं? खैर! सबकी पसंद को नमन!💐

    Bargain अथार्त मौल भाव करना भारतीयों का धर्म हैं जरूऱ करें! आप कॉमिक्स को उसकी कहानी या उसके परिपूर्ण चित्र से उस कॉमिक्स को तोलें, ना की गुमनामी से! 💐 

    कॉमिक्स के कलेक्शन के इस शौक मैं मैनें बेकार कॉमिक्स की जो किमत़ अदा की हैं, तो नयी राज कॉमिक्स की किमतें सही है उस हिसाब से! बाके सबके अपने विचार हैं साहब!💐🙏 सबके विचारों का आदर अपनी जगह! 

   बस नकारात्मकता ना फैलाएं जो सही लगें वो कॉमिक्स लें! 

     आपका कॉमिक्स वाला दोस्त "हिमांशु" 😊🙏

Monday, 21 December 2020

भावपूर्ण श्रद्दांजलि

राज कॉमिक्स के जनक श्री राजकुमार गुप्ता जी को भावपूर्ण श्रद्दांजलि
कुछ मित्रों ने मुझे बताया की ये बेहद ही नरम और सरल हृदय के थे .

 

राज कॉमिक्स में महानायको के प्रिय भोजन


 

Monday, 30 November 2020

मनोज गुप्ता जी की कलम से

 प्री-बुकिंग वो धीमा जहर है, जो लगातार कामिक्स इंडस्ट्री को खोखला कर रहा है। कामिक्स के प्रति आपके जूनून और आपके कोमल भावनात्मक लगाव का शोषण है। आने वाले समय में किसी भी fraud का ये जन्मदाता सिध्द हो सकता है,इसे आदत मत बनाइये। प्री-बुकिंग के नाम पर आपकी गाढ़ी कमायी को जब पब्लिशर्स अपना हक समझने लगे,तो हालात बद् से बद्तर होते जाते हैं। पैसा जेब में आते ही काम करने की रफ्तार सुस्त हो जाती है। मानव स्वभाव है, कि वह उस काम को पहले करना चाहता है। जिसे करके पैसा मिलना है। जेब में आया पैसा टिकता नहीं, तुरंत खर्च हो जाता है। मैं पिछले लगभग 25 वर्षों से इस बुक इंडस्ट्री से जुड़ा हुआ हूँ। हर पब्लिशर्स फाइनेंशियली strong हैं। प्री-बुकिंग का उन्हें‌ केवल चस्का लगा हुआ है। जो कहीं कमजोर पड़ते भी हैं। उन्हें सेलर्स और डिस्ट्रब्यूटर्स स्पोर्ट करते रहते हैं। पिछले 10 महीनों में जो भी पुस्तकें छप कर आयी हैं, उनमें से क्या आप किसी एक पुस्तक का नाम बता सकते हैं, जो प्री-बुकिंग करके आपको कोई विशेष लाभ मिला। किताब आती है, सबके लिए भरपूर मात्रा में उपलब्ध होती है। उल्टा पब्लिशर्स पर क्वालिटी प्रेशर होता है, कि बाइडिंग, प्रिंटिंग, पेपर क्वालिटी सब पर फोकस रखना पड़ता है। समय पर लाने की कोशिश रहती है, क्योंकि पैसा लगा होता है।हम अपने जूनून को जिंदा रखे, ये तो सबसे बड़ा अमृत है। प्रकाशक को समझने में देर नहीं लगती, कि किताब का क्या हश्र होने वाला है। 

बहुत जल्दी एक अन्य बहु-प्रतीक्षित प्रकाशन आपके सम्मुख होगा। मुझे नहीं लगता कि वो प्री-बुकिंग जैसी कोई भी बात करेगा, परंतु उसके नाम पर बाजार में होने वाली किसी भी प्री-बुकिंग से आप उसको स्पोर्ट करोगे, ये विचार ही हास्यपद है। पिछले कुछ दिनों में इसी तरह से एक बहुचर्चित और बहु-प्रतीक्षित कामिक्स की प्री-बुकिंग से आपने प्रकाशक को‌ कितना स्पोर्ट किया, या क्या फायदा आपको मिला। आपने स्वयं महसूस किया है। बाकी आप स्वयं प्रबुद्ध पाठक हैं। मैं नाचीज आपको कोई रास्ता दिखा सकता हूँ, इस धोखे में बिल्कुल भी नहीं हूँ। क्योंकि, मन-आपका, पैसा-आपका,समझ-आपकी। पर हां...;

HBM never support Pre-Booking. 

HBM never do Pre-Booking.

नोट- यदि किसी प्रकाशक या पाठक को मेरी किसी बात से ठेस पहुँची हो तो क्षमाप्रार्थी हूँ ।

Saturday, 14 November 2020

कॉमिक्स प्रंशसको की कलम से लेख

 ***

उसकी आँखें किसी ने नहीं देखी!!
खुद प्राण सर ने भी नही! अपने ज़माने का फुलटू मॉडर्न टीनएजर..आँखों को ढकते लंबे बाल, चुस्त-दुरुस्त काया, दिल्ली की गलियों में मस्ती करते फिरने वाला किशोर! क्रिकेट का दीवाना..फ्लिर्टी बॉयफ्रेंड...क्लास में स्लीपिंग मोड, दोस्तों का दोस्त, टेक्नो सैवी, मस्तमौला...उसके व्यक्तित्व के अनेक पहलू! 
         जी हाँ...अपना प्यारा शरारती, चतुर, डरपोक, भोला-भाला, मनमौजी..बिल्लू!!

       प्राण सर का ये करैक्टर अपने आप में बहुत ही मजेदार और आकर्षक है! खास बात ये की केवल इसी करैक्टर को क्रोनोलॉजिकल आर्डर में बढ़ते दिखाया गया है...माने रियल लाइफ जैसा! शुरुवाती कॉमिक्स में नन्हा शरारती बच्चा बिल्लू है( कुछ कुछ पिंकी जैसा ही)! उसके रुझान भी बस खेल-कूद, आइसक्रीम, चॉकलेट, लुका-छुपी, स्कूल से बचने का बहाना, पापा की डांट का डर...इन्ही के इर्द-गिर्द घूमता। फिर धीरे धीरे बढ़ता बिल्लू...टीनएज यानि किशोरावस्था में पहुँचता! यहाँ से कहानियां ज़्यादा रोचक होतीं। लेटेस्ट फैशन में रहना, मोबाइल-कंप्यूटर में खटर-पटर में दिलचस्पी,  रातों को हॉलीवुड मूवीज़ देखना, स्कूल में क्लास के वक़्त खर्राटे लेना, गर्लफ्रेंड जोज़ी के साथ मस्ती करना,और बेशक....हर वक्त क्रिकेट खेलने को तैयार रहना...ये सब उसके नए शौक व पसंद! इस तरह बिल्लू की कहानियों में कुछ बदलाव आये, जो अधिक मनोरंजक ही थे...ज़्यादातर कॉमिक हीरोज या तो वयस्क होते हैं या किड्स हीरोज। ऐसे में एक टीनएजर हीरो की ज़िन्दगी के किस्से देखने-पढ़ने में अपना मज़ा आता था! 

        हरदम कंधे पर शान से क्रिकेट बैट लिए, कैप पहने,दूसरे हाथ से बॉल उछालता हुआ आता दिखाई देता बिल्लू! क्रिकेट के मैदान का सितारा! अपनी सोसाइटी का स्टार बल्लेबाज़...चौके-छक्के उड़ाता। 
        दूसरी तरफ बजरंगी पहलवान से पंगे लेता, फिर उसे मूर्ख बनाता, जान बचाकर भागता या हड्डी-पसली तुड़वाता हुआ। रुस्तम-ऐ-हिन्द बजरंगी उस्ताद के डर से बचपन से किशोरावस्था तक डरता-भागता,और मन ही मन गबरू जवान बनके उसे मज़ा चखाने के ख्वाब देखता बिल्लू। 
            साथ ही साथ क्लासमेट और पडोसी जोज़ी के साथ रोमांस! कभी स्कूटर पर घुमाना या फ़ास्ट फ़ूड के लिए रेस्त्रां ले जाना, पर टीनएज की प्रॉब्लम से जूझता जेब में बस 50-100 का नोट होना..उस पर मन ही मन तिकड़म लगाना, गर्लफ्रेंड की नज़र में इज़्ज़त बनाये रखना..साथ साथ मौका मिलते ही स्कूल की नयी स्टूडेंट पर  इम्प्रैशन ज़माने की कोशिश करने में भी पीछे न रहना...गर्लफ्रेंड को मालूम हो जाये तो खैर बचाकर भागना और बहाने बनाना...ये सब बिल्लू के चुलबुले किशोर स्वाभाव की झलकियाँ!
        साथ ही कच्ची उम्र का मिडिल-क्लास, तंग-जेब मासूम आशिक़! अमीर कर्नल की बेटी से इश्क़ लड़ाता, खुर्राट कर्नल की नज़रों में फ़ालतू आवारा शरारती छोकरा! कर्नल की आँख बचाकर जोज़ी से मिलने उसके घर जाता...कर्नल की सख्त आवाज़ से उछल पड़ता, फिर रायफल की ..रेट रेट रेटटटट...निकलती गोलियों से सर झुकाकर बचता भागता बेचारा दिलफेंक आशिक़! 

   सब के सब किस्से मज़ेदार व खिलखिलाने वाले। अपने ज़माने के टिपिकल टीनएजर का प्रतिनिधि...शौक, कारनामे, इश्क़बाजी..सब कुछ! डायमंड कॉमिक्स में ये किरदार मुझे सबसे ज़्यादा पसंद होने की यही सब वजहें हैं...। अपने आप में एक मज़ेदार किरदार...आज भी बिल्लू कॉमिक्स पढ़ने में वही मज़ा आता है जो पहले! :)

Wednesday, 28 October 2020

कॉमिक्स प्रंशसको की कलम से लेख

 संसार में सुख के सत्य की तलाश में सिकंदर ने ज़मीन नाप दी, बुद्ध ने गृह त्याग दिया. सुख पर लिखी किताबें बेस्टसेलर बन गयी और सुख पाने के चक्कर में जाने कितने घनचक्कर मारे - मारे फिरते हैं. सुख कमबख्त है कि मुहल्ले की सामूहिक महबूबा बना हुआ है, जो क्षण भर को छत पर कपड़े सुखाने के लिये आये और उस क्षण के इंतज़ार में मुहल्ले का लौण्डागण दिन भर धूप में विद्यमान विटामिन डी सोख सोख कर टैन होते चला जाये.

तो मालिकों सुख की तलाश में बियाबान-रेगिस्तान भटक चुकने के बाद अचानक रेल्वे स्टेशन पर एक कॉमिक पा कर खुशी से झूम जाने वाले उस बालक की याद आयी जो कभी हम स्वयं हुआ करते थे. 

एक आठ रुपये की अदद कॉमिक पा कर कारूँ का खज़ानावाली जो फील आती थी उसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता. चिथड़ों में व्याप्त कॉमिक कम दामों में खरीद कर उसे किसी पुरातत्त्ववेत्ता वाली कुशलता से कभी सी कर, कभी स्टेप्लर मार कर पुनर्जीवित करने के सुख को भुला कर हम दुनिया के मायाजाल में ऐसे रमे कि भूल गये बण्डल बण्डल कॉमिक खरीद कर अलमारी सजा लेना सुख नहीं... सुख उन्हें बिखेर के फिर पढ़ने में है. फिर उन फटे कवर वाली कॉमिक्सों को देख कर याद करने में है कि इन्होंने हमारा कितना जीवन कैसे स्पेशल बनाया है इसलिये आज भी कॉमिक्स पढ़ना सच्चा सुख लगता है -

Sunday, 11 October 2020

कॉमिक्स_वाले_अंकल

 #कॉमिक्स_वाले_अंकल 


वो हमारे कॉमिक्स वाले अंकल थे। नाम तो उनका कभी पूछा नहीं। ये भी पता नहीं हिन्दू थे, मुसलमान थे या किस जाति से थे। ये सब बातें हमारे लिए बेमतलब बेमानी थीं। हम बच्चों को बस इतना ही पता था कि गली में उनकी छोटी सी दुकान थी। यूं दुकान तो किरयाने की थी, पर उसी के एक कोने में ढेर सारी कॉमिक्स भी रखी रहती थीं, और यही बात उनकी उस छोटी पुरानी सी दुकान को खास बनाती थी। 

जब मम्मी पैसे देकर घर का कुछ सामान लाने को भेजती तो हम दूसरी बड़ी दुकानों को छोड़कर कॉमिक्स वाले अंकल की छोटी सी दुकान में घुस जाते। जब तक अंकल सामान तौलते तब तक हम कॉमिक्स उलट पलट कर देखते रहते। जाने कैसी खुशी मिलती थी वहां। 

अंकल की दुकान पर ग्राहक कम ही होते थे। सब कहते थे उस पुरानी दुकान में कुछ घुटन सी रहती है। पता नही क्यों हमें वो घुटन कभी महसूस ही नहीं हुई। कभी जेबखर्च को कुछ पैसे मिलते तो लेकर हम सीधा अंकल की दुकान पर पहुंच जाते। उस वक्त वो 50 पैसे में कॉमिक्स किराये पर दिया करते थे। घर ले जाकर पढ़ने का एक रुपया लगता था। हम कम पैसो में ज़्यादा कॉमिक्स पढ़ने के लालच में वहीं बैठकर घण्टों कॉमिक्स पढ़ते रहते थे। वहीं बैठकर पढ़ने पर अंकल भी खुश रहते थे। शायद इससे उन्हें अकेलापन नहीं लगता था। गली की उस छोटी सी पुरानी दुकान में एक अलग ही किस्म का सुकून था।

वक्त बीत गया। हम बच्चे से बड़े हो गए। पुराना शहर भी छूट गया। कॉमिक्स का शौंक कुछ सालों के लिए पूरी तरह छूट कर फिर दोबारा भी शुरू हो गया। पर ज़िन्दगी की भागमभाग में उन सब यादों पर जैसे धूल की परत सी जम गई थी। 

फिर अभी 2 साल पहले किसी काम से पुराने शहर जाना हुआ। तब फिरसे कॉमिक्स वाले अंकल और उनकी दुकान की याद आई। मन में वही पुरानी उमंगें लिए गली की उस सबसे पुरानी दुकान पर पहुंचा।

अंकल अब नहीं रहे। दुकान आंटी और उनका लड़का मिलकर सम्भालते हैं। एक कोने में कुछेक कॉमिक्स भी पडी धूल खा रही हैं। पर वो पहले जैसा सुकून नहीं है। मैं ज़्यादा देर दुकान में खड़ा नहीं रह सका। उस छोटी, पुरानी दुकान की घुटन अब महसूस होने लगी है।


नोट: तस्वीर केवल प्रतीकात्मक मात्र है।

डोगा ही है रियल हीरो....

 डोगा ही है रियल हीरो....

आज की ये पोस्ट ये बताने के लिए है कि डोगा रियल हीरो क्यों है? नागराज और ध्रुव बहुत लोकप्रिय पात्र हैं लेकिन मुझे उनसे ज़्यादा डोगा पसन्द है। इसकी वजह है डोगा की कॉमिक्स की रियल स्टोरीज़। 


अगर डोगा की स्टोरीज़ को नागराज और ध्रुव की कॉमिक्स से कम्पेयर करेंगे तो पता चलेगा कि डोगा की कॉमिक्स वास्तविकता के कितने करीब होती हैं। जो समस्याएं हम अक्सर न्यूज़ में या अखबारों में पढ़ते हैं, डोगा ऐसी ही समस्याओं को जड़ से उखाड़ता दिखाई देता है।


आप सब कॉमिक प्रेमियों को याद होगा कि जब नागराज शाकूरा  के चक्रव्यूह में फंसा, नागपाशा द्वारा दिखाए गए सपनों के मंदिर का पीछा कर रहा था और ध्रुव सर्कस में स्टार फिश की मानसिक शक्तियों का सामना कर रहा था ...

तब डोगा बस में लगे स्पीड बम से 40 जिंदिगियों को बचाने की ज़बरदस्त जद्दोजहद कर रहा था।

जब नागराज और ध्रुव परग्रहीयों के हमले से राजनगर की तबाही होने से रोक रहे थे....

तब डोगा सिंथेटिक दूध बनाने वाली फैक्ट्री को नेस्तनाबूद कर रहा था। (कायर, हाथ और हथियार)

जब नागराज और ध्रुव विषाला की प्रलय से दुनिया को बचा रहे थे...

तब डोगा एग्जाम का पेपर लीक करने वाले शोला गैंग को सबक सिखा रहा था। (मारा गया डोगा, मरेंगे डोगा के दुश्मन)

जब नागराज और ध्रुव कल्कि अवतार और मसीहा को दुनिया में विनाश फैलाने से रोक रहे थे...

तब डोगा भिखारियों को मौत के घाट उतारने वाले हत्यारे के लिए मृत्युदाता बना हुआ था और दलित नेता का अपमान करने के इल्जाम से खुद को बचाने की कोशिश कर रहा था। (डोगा को गाड़ो)

जब नागराज और ध्रुव देवताओं की मदद कर रहे थे जिससे दुनिया में हमेशा के लिए कलियुग व्याप्त न हो...

तब डोगा करवाचौथ सुहागनों पर मंडराता खून का खतरा खत्म कर रहा था।


इसके अलावा भी...

कभी डोगा नवजात बच्ची को कार के टायर से कुचलने वाले गोलू को चार किलोमीटर आगे जाकर सज़ा दे रहा था।

तो कभी डोगा रक्तदान करके हिन्दू मुस्लिम फसाद को खत्म करने की कोशिश में लगा था। (डोगा हिन्दू है सीरीज़)

कभी डोगा बूढ़े लोगों पर खतरा बने युवा को खत्म कर रहा था। (वृद्ध वॉरियर सीरीज़)

और कभी डोगा करोड़ो की संपत्ति के मालिक 18 वर्षीय कुमार सक्षम की अंडरवर्ल्ड से हिफाज़त कर रहा था। 

अब आपको पता चल ही गया होगा कि डोगा क्यों है रियल हीरो क्योंकि "*डोगा है ही ऐसी चीज़*"।

एक बहस जिसका ना कोई आधार ना कोई अन्त....

 एक बहस जिसका ना कोई आधार ना कोई अन्त....


ध्रुव चंडिका को क्यों नहीं पहचान पाता?...

सभी अपने अपने तर्क देते हैं. विपक्ष वाले कहते हैं ध्रव इतनी सी बात नहीं जान सकता.. बस आंखों को कवर करने से वो चेहरा नहीं पहचान पाता, आवाज नहीं पहचान पाता और उसके दिमाग पर सवालिया निशान लगाते हैं....पक्ष वाले कहते हैं चंडिका आवाज बदल लेती होगी, चेहरे में कुछ बदलाव कर लेती होगी, अपनी गंध छुपाने के लिये कोई यंत्र प्रयोग करती होगी इत्यादि...

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मैं कहता हूं ये सवाल है ही क्यों?

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भले ही‌ श्वेता डरपोक और चंडिका बहादुर, भले ही चंडिका कोई यंत्र प्रयोग करती हो जो उसकी गंध, चेहरा, आवाज सब बदल दे... इन सब के बावजूद क्या अगर ध्रुव ठान ले कि उसे चंडिका  का राज पता लगाना है तो क्या वो पता नहीं लगा सकता?.... जिस स्तर का ध्रुव का दिमाग स्थापित गया है उसके लिये ये बांये हाथ का काम है.... आखिर पहले भी उसने हर बार दिमाग का इस्तेमाल करते हुये ही जीत हासिल की‌ है. कई बार परदे के पीछे छुपे विलेन्स का राज फाश किया है... फिर श्वेता/चंडिका के मामले में उसके दिमाग पर सवालिया निशान क्यों लगाने लगते हैं?

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असल बात ये है कि ध्रुव आज तक ये बात इसलिये नहीं जान पाया क्योंकि लेखक ने कभी चाहा नहीं कि वो यह बात जाने..  ध्रुव एक काल्पनिक किरदार है तो उसकी ताकत और कमजोरी सब लेखक की कलम पर निर्भर है. ध्रुव वही सोचेगा वही करेगा जो लेखक के अनुसार उसकी कहानी को आगे बङायेगा और ध्रुव और चंडिका की कहानियों का एक चटपटापन यह भी‌ है कि ध्रुव चंडिका की असलियत नहीं जानता इसलिये उसके साथ मिलकर बिना किसी टेंशन के दुश्मनों की वाट लगा सकगा हैं अगर वो जान जाये कि ये उसकी बहन श्वेता है तो शायद फिर चंडिका का रोल इतना बहादुरी वाला नहीं हो पायेगा क्योंकी ध्रुव उसे ये सब नहीं करने देगा. यह अनभिग्यता ही दोनों के एक साथ काम करने में सहायक है. जिस दिन अ‌नुपम सर ने सोचा कि एक कहनी लिखें जिसमें ध्रुव को ये राज पता चल जाये तो वह ऐसे १०० तरीके दिखा देंगे कि ये राज खुल जाये.

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ये सवाल दो ही टाईप के लोग पूछते होंगेंं...

१) जो मासूम हैं और सच में इस बात को सोचकर हलकान होते होंगे कि आखिर ये पहचान क्यों नहीं रहा.

२) जिनका फेवरिट किरदार कोई और है और वो ध्रुव को कम बताने के लिये उसके दिमाग पर उंगली उठाते होंगे.

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दोनों टाईप वालों से निवेदन है कि कृप्या दिमाग को ज्यादा लोड ना दें... लाईट लें.. कामिक्स पढें..कहानी के मजे लें!

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धन्यवाद

Sunday, 20 September 2020

शीर्षक - बांकेलाल और उल्टी चाल

 शीर्षक - बांकेलाल और उल्टी चाल 




एक सुबह बांकेलाल ने विशालगढ़ का राजा बनने के लिए बड़ी ही चालबाज युक्ति निकाली । 


बांकेलाल - ओ मेरा भोला है भंडारी करे नन्दी की सवारी शम्भूनाथ रे ओ शंकर नाथ रे । 

शिव जी ( दिल से पुकारे जाने पर तुरंत प्रकट होते है ) - क्या बात है बांके आज सुबह-सुबह मेरा नाम कैसे पुकार बैठे ?


बांकेलाल - वो प्रभु क्या है कि कल वन में ऋषि भागलँगोटी के लँगोट को बंदर चुरा ले गया और उस लँगोट को मैंने उस बन्दर से छीन कर ऋषिमुनि को लौटाया । लँगोट पहनते ही वो भागने लगे और भागते भागते उन्होंने बताया कि " सुबह सुबह ले शिव का नाम शिव आएंगे तेरे काम " 

शिव जी - और तुमने मेरा नाम ले लिया ? 

बांकेलाल - हिहिहि । 


बांकेलाल की हिहिहि से भगवान शिव जी के गले से लिपटे नाग जी क्रोधित हो फुफकार उठे ।


क्रोधित नाग ( फुफकारते हुए ) - भगवान शिव जी के सवाल का जवाब देने की जगह हिहिहि करने की हिम्मत कैसे की  तूने ? तेरी तो अभी के अभी डसता हु तुझे सिकड़े पनौती । 


बाँकेलाल - क्ष क्षमा प्रभु क्षमा । 

शिव जी - तथास्तु । 


बांकेलाल ( भयभीत हो आश्चर्य में ) - नही नही प्रभु । मैं तो नाग जी से क्षमा मांग रहा था वर में विशालगढ़ का सिंहासन मांगना था मुझे । 

शिव जी - पर दर्शन देने पे तो सिर्फ एक वर देने की रीत है बांके जो हम दे चुके । अगर हम तुम्हे क्षमा ना करते तो अब तक मेरा कंठहार नाग तुम्हे डस चुका होता और तुम्हारी आत्मा बैकुंठधाम को प्रस्थान कर चुकी होती । चलो फिर आज के लिए इतना ही । अहम गच्छषि । 


अहम गच्छषि अर्थात अपने घर जाना । हिहिहि। यानी शिव जी हिमालय प्रस्थान कर गए । 


बांकेलाल - बेड़ागर्क । सोचा था वर स्वरूप विशालगढ़ का सिंहासन मांग लूंगा शिव जी से ताकि रोज रोज षड्यंत्र बनाने की जरूरत ही ना रहती । पर फिर से मेरी योजना का बेड़ागर्क हो गया । 


हिमालय पे 


माता पार्वती - आज तो अच्छे फसे थे आप प्रभु । 

शिव जी - सत्य कहा आपने देवी । भक्त तो यह मेरा है पर बुद्धि इसमें महाभारत के शकुनि की है । धन्य है मेरा कंठहार जिसकी पैदा की गई स्तिथी के कारण मैं बांके को वर देने से बच गया वरना आज ये विशालगढ़ का राजा बन ही बैठा था । 


शिव जी हिमालय के ठंड में भी अपने सर पे आये पसीने की बूंद को पोछते है और माता पार्वती उन्हें देख मुस्कुरा रही होती है । 


धरा पे नीचे बांकेलाल फिर से नई षड्यन्त्रकारी योजना बनाने में लग चुका है जो इस बार की तरह उल्टी न पड़े । 


समाप्त ।